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बेहसुमा, गुर्जर राजा नैन सिंह नागर जी.

बेहसुमा, गुर्जर राजा नैन सिंह नागर जी. राजा नैन सिंह नागर को परीक्षितगढ़ के राजा नैन सिंह गुर्जर के नाम से भी जाना जाता है, जो 18 वीं सदी में भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले के एक उल्लेखनीय गुर्जर राजा थे। गुर्जर राजा नैन सिंह का जन्म 12 नवंबर, 1746 को उत्तर प्रदेश के बेहसुमा में गुर्जरों के नागर वंश में हुआ था। उनके पिता राजा गुलाब सिंह नगर और माता रानी माया थीं। वह किले परीक्षितगढ़ और हस्तिनापुर के पुराने पांडेश्वर मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं।आज भी बेहसुमा में उनकी विरासत के कुछ अवशेष देखने को मिलते हैं जीमने है उनकी हवेली और दीवाने खास । गुर्जर राजा नैन सिंह नागर राजा गुलाब सिंहं कुंवर किशन सिंह के राजगद्दी पर बैठने से मना करने पर दिल्ली सल्तनत के बादशाह शाह आलम द्वितीय ने गुलाब सिंह को पूर्वी परगने का राजा बना दिया । राजा गुलाब सिंह के रानी मायाकौर से पाँच पुत्र हुए भूप सिंह,जहाँगीर सिंह,नैन सिंह,बीरबल सिंह,सेदू सिंह । दूसरी रानी शीशकौर से चार पुत्र हुए अजब सिंह,चमन सिंह,खुशहाल सिंह और भवानी सिंह। तीसरी रानी सदाकौर से कोई सन्तान नहीं थी और खुशहाल और भवानी सिंह की अकाल मृत्यु हो गई थी तथा इस प्रकार राजा गुलाब सिंह के सात पुत्र बचे। कुंवर नैन सिंह नैन सिंह का जन्म 21 नवम्बर 1746 ई0 को बहसूमा में हुआ था। रानी मायाकौर की तीसरी संतान नैन सिंह बचपन से ही बड़े चतुर स्वभाव के थे। वे बचपन में अपने पिता के साथ युद्ध में जाया करते थे। जब राजा जैत सिंह का दूसरा युद्ध काबुल पठानों से हुआ तब नैन सिंह लगभग 25 वर्ष के थे और वे अपने पिता के साथ युद्ध में गये । इस युद्ध के पश्चात नैन सिंह पंजाब चले गये और वहां उन्होने सिख धर्म अपना लिया तथा सिख धर्म का प्रचार भी करने लगे । सिखों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह (1675-1708) ने खुलासा सेना का गठन किया था। हिन्दुओ पर बढ़ते अत्याचारों के विरोध में उदासीन भजन करने वाले सिखों ने अस्त्र उठा लिये थे। पिता के मना करने पर भी नैन सिंह खालसा के पांच चिन्ह धारण करते थे - केश,कंधा,कच्छा,कड़ा और कटार । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि गुरू गोविन्द सिंह के माता भी गुर्जर थी । राजा नैन सिंह राजा गुलाब सिंह वृद्ध हो चुके थे । उन्होने अपने ज्येष्ठ पुत्र भूप सिंह से राजगददी संभालने के लिये कहा परन्तु उन्होने मना कर दिया । नैन सिंह वैसे तो बुलाने पर भी नहीं आते थे किन्तु पिता के काफी अनुरोध करने पर पंजाब से वापस आ गये । राजा गुलाब सिंह कुंवर नैन सिंह को लेकर शाह आलम द्वितीय से मिले और कहा कि यह तो सिख धर्म अपना रहा है। शाह आलम द्वितीय ने कुंवर नैन सिंह को समझाया और जब वे नहीं माने तो अन्त में कहा कि अगर आप नहीं मानते हो तो फाँसी पर चढ़वा दूंगा और तब कुंवर नैन सिंह भड़क गये और म्यान से तलवार निकाल कर कहा,आज मुझे हिन्दुत्व से अलग नहीं कर सकते और न ही मैं सिख धर्म को छोड़ूंगा । आज चाहे मैं राजा बनूं या नहीं पर इस बहादुर पर बादशाह शाह आलम द्वितीय चकित रह गए तभी बादशाह ने राजा गुलाब सिंह को बताया कि आपके सब सातों पुत्रों में कुंवर नैन सिंह सबसे बहादुर बेटा है। आप इन्ही को राजा बनाएं,कुंवर नैन सिंह अपने नाम को चारों और रोशन करेगा और नागर वंश के राजा नैन सिंह का नाम उसी प्रकार से लिखा गया जिस प्रकार से सूर्यवंश में राजा रघु का था। नागर वंश में राजा नैन सिंह का नाम सूर्य के समान है। सैन्य एवं शस्त्र भण्डार राजा नैन सिंह ने सेना में नई भर्ती की और पैदल तथा घुड़सवार दोनों प्रकार के सैनिकों को पूरा प्रशिक्षण दिलाया । किले के समीप ही सेना की छावनी थी जिसमें घुड़सवार एवं कौशल पैदल सैनिकों का पृथक-पृथक प्रबंध था। परम्परागत अस्त्र - शस्त्रों के अतिरिक्त नई तकनीकी के अस्त्र शस्त्रों का भी एक बड़ा भण्डार स्थापित किया । सैनिकों को वेतन के अतिरिक्त अन्य सुविधायें भी उपलब्ध कराई जाती थी। इनकी सेना साहस,शौर्य,युद्ध-कौशल और देशभक्ति से ओतप्रोत थी। इस वीर सेना की ख्याति पूरे देश में फैल चुकी थी । राजकोष की स्थापना राजा नैन सिंह ने एक राजकोष की स्थापना किला परीक्षितगढ़ और दूसरे राजकोष की स्थापना बहसूमा में की। इसके कोषाध्यक्ष उन्ही के वंशज कहलाए जाने वाले भाई दर्शन लाल नागर नियुक्त किए गये थे। उनके बाद 1814 ई0 में नन्दलाल नागर नियुक्त हुए । कोषाध्यक्ष के पैत्रक भवन आज भी किले बहसूमे के निकट खण्डहर के रूप में पड़े हुए हैं। इन्हीं के वंशज आज भी मेरठ में मौजूद है। लोकप्रिय अस्पताल में अध्यक्ष एक प्रसिद्ध समाजसेवी माननीय डाॅ अतुल नागर जी इसी वंश से ताल्लुक रखते हैं। सुरंगों का निर्माण राजा नैन सिंह ने अपने शासनकाल में सुरंग बनवाई क्योंकि दुश्मन से सुरंग के रास्ते जाकर हमला करते हैं। यही कारण हुआ कि राजा नैन सिंह मराठों से विजय हासिल कर पाये। सबसे पहले राजा नैन सिंह ने बहसूमे में सुरंग ’दीवाने आम’ से हस्तिनापुर के रास्ते तक बनवाई यह सुरंग आज भी हसूमे मे राजा नैन सिंह के दीवाने- आम महल में मौजूद है। दूसरी सुरंग राजधानी किला परीक्षितगढ़ के राजमहल से गढ़मुक्तेश्वर तक पहा ’नका कुआँ’ है। इसी सुरंग के रास्ते से जा कर राजा नैन सिंह मराठों पर हमला किया करते थे और इसी कारण मराठे बुरी तरह पराजित हुए थे । राजा नैन सिंह ने अपने राज्य का विस्तार मुरादाबाद तक कर लिया था । घुड़सवार सेना राजा नैन सिंह ने अपनी सेना में घुड़सवारों की भर्ती की और घुड़सवार सेना का गठन किया । घुड़सवार सेना की छावनी बहसूमे में बनाई । वहीं पर आज घुड़सवार सेना की छावनी खण्डहर के रूप में विद्यमान है। इस खण्डहर का चित्र भी साथ में संलग्न है। राज्य में गढियो की स्थापना राजा नैन सिंह ने राज्य की सुरक्षा एवं राजस्व प्राप्ति के लिए पांच गढियों का निर्माण कराया जिनके अवशेष आज भी खण्डहर के रूप में पड़े हैं। गढ़ी छोटे किले के रूप में होती थी। इनके अधीन अनेक गांव होते थे: पुट्ठी - बड़े भाई जहाँगीर सिंह के अधिकार में । ढिकौली (निकट मवाना) छोटे भाई बीरबल सिंह के अधिकार में । गोहरा - छोटे भाई चमन सिंह के अधिकार में । कनखल - छोटे भाई अजब सिंह के अधिकार में । फतेहपुर सीकरी - छोटे भाई सेदू सिंह के अधिकार में । बहसूमा को राज्य का रूप बहसूमे का अधिकार एवं जिम्मेदारी सबसे बड़े भाई भूप सिंह को सौंपी गई और भूप सिंह का समस्त परिवार आज भी बहसूमा में रहता है। राजा नैन सिंह ने बहसूमा को दिल्ली सल्तनत से राज्य का अधिकार दिलाया था। 1792 ई0 में उन्होने यहा किले का निर्माण कराया और साथ ही सैनिक भवन भी बनवाया । उनकी घुड़सवार सेना बहसूमे में भी रहती थी। उन्होने राजमहल तथा दिवाने आम का निर्माण भी कराया । दूर-2 से राजपुरोहितों,राजवैद्यों तथा शिल्पकारों को राजकीय सहायता देकर यहा बसाया गया । इस प्रकार किला परीक्षितगढ़ राज्य की उप राजधानी बहसूमा को बनाया गया। जब राजा नैन सिंह पंजाब से वापस आये तो उनके साथ पश्चिमी सिक्ख जाट समुदाय भी आया जिसे उन्होने बहसूमे तथा गढ़मुक्तेश्वर के पास बसा दिया और खेती के लिए जमीन प्रदान की । जाटों ने खेती तथा युद्ध दोनों ही कार्यो में राजा नैन सिंह का साथ दिया । आज भी बहसुमा में काफी संख्या में जाट लोग रहते हैं। पांच ग्राम सिक्ख गुर्जरों के भी राजा नैन सिंह ने ही बसाये थे । इन सभी ग्रामों में सिक्ख गुर्जर रहते हैं। कृषकों को सहायता राजा नैन सिंह ने खेतों के बीच तालाब,कुएं एवं रास्ते बनवाये । कृषकों की समस्या का समाधान वे तुरन्त करते थे । कृषकों से माल गुजारी बहुत कम ली जाती थी। वर्ष 1798 ई0 में सूखा पड़ जाने पर कृषकों की मालगुजारी तो माफ कर दी किन्तु शाह आलम द्वितीय के मांगने पर दो लाख की मालगुजारी स्वयं जमा की जिसमें से कुछ धन लाला हरसुखराय जैन दिल्ली से लिया था। धन वापस करने पर लाला हरसुखराय ने लेने से मना कर दिया और जैन मंदिर बनवाने के लिए जमीन देने का अनुरोध किया जिसे राजा नैन सिंह ने स्वीकार किया। राज्य का विस्तार पुष्पावतीपुर से लेकर ऋषिकेश तक और दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्र से लेकर रूहेलखण्ड तक इन्होने अपने राज्य का विस्तार किया । अधिक विस्तार करने का लाभ इसलिए नहीं था क्योंकि राज्य दिल्ली सल्तनत के अन्र्तगत था। विवाहित जीवन राजा नैन सिंह का विवाह ग्राम रोडपुर के मावी गोत्र के प्रधान रतीराम की पुत्री जैन कौर के साथ सम्पन्न हुआ । जैन कौर से दो पुत्र हुए - नत्था सिंह और गुरूनामी सिंह तथा एक लड़की थी जो लन्ढोरा ब्याही थी। राजा नैन सिंह का दूसरा विवाह अधाने गोत्र में साहब कौर से हुआ । तीसरा विवाह रहमापुर,माखानानगर की दरयाब कौर के साथ हुआ । दूसरी और तीसरी रानी के कोई संतान नहीं थी । वर्तमान स्थिति राजा नैन सिंह के कर्ताधर्ता अधिराज सिंह थे। उनके द्वारा पूरी रियासत की जिम्मेदारी संभाली जाती थी। आगे चलकर न्यावर सिंह के चार लड़के हुए 1- चै0 हरबंस सिंह 2- मुंशी नैन सिंह 3- तेज सिंह 4- श्योराज सिंह। चै0 हरबंस सिंह की दो लड़कियां थी, जिसमें से एक सिसोना में रामसिंह जी के लड़के को ब्याही थी। दूसरी लड़की मुडलाना के डिप्टी जयपाल सिंह के छोटे भाई फतह सिंह को ब्याही थी,अतः हरबंस सिंह जी के कोई लड़का नहीं था,इसलिए उन्होने अपने भाई तेज सिंह के लड़के चै0 जयकरण सिंह को गोद लिया था। जयकरण सिंह जी दो भाई थे, दूसरे भाई का नाम रामपाल सिंह था जिनका स्वर्गवास हो गया । उनकी तीन लड़कियां थी, पहली चै0 रजब सिंह दिसाला,दूसरी मिलकपुर में चै0 तलब सिंह के यहा तथा तीसरी नैन खेड़ा में वकील धर्मपाल के यहा सहारणपुर में ब्याही थी। चै0 जयकरण सिंह के चार लड़के हैं जिसमें एक चै0 अशोक सिंह जो, ए0एस0 कालेज मवाना में सेवारत है,दूसरे चैक0 सतीश मुज्जफरनगर मे रहते हैं। तीसरें कुंवर देवेन्द्र सिंह ग्राम हसापुर,तह0 मवाना मेरठ में रहते हैं। चौथे चै0 आदर्श कुमार, आई0ए0एस0 हैं,जो वर्तमान में राष्ट्रपति भवन दिल्ली में सेवारत हैं। धार्मिक नीति राजा नैन सिंह सभी धर्माे का सम्मान करते थे । वे धार्मिक प्रवृति के थे तथा मद्य,मांस के विरोधी थे। उन्होने हिन्दू,जैन तथा सिख धर्मो के कार्यो में भी सहयोग दिया । हिन्दू मन्दिरों का निर्माण राजा नैन सिंह ने बहसूमा में किले के पास शिव मंदिर का निर्माण कराया। हस्तिनापुर में कुंवर किशन सिंह द्वारा बनवाये गये पाण्डेश्वर मंदिर तथा श्रीकृष्ण मंदिर को बढ़ाया तथा शिव मंदिर,कर्ण मंदिर,द्वोपदी घाट का निर्माण कराया । उनहोने गढ़ मुक्तेश्वर स्थित महाभारत काल के कुछ नक्के कुओं का भी जीर्णोद्धार कराया । कहा जाता है कि यह वही कुआं हैं जिसके जल से स्नान करने पर राजा जनमेजय का कोढ़ दूर हुआ था। इस नक्के कुएं का जीर्णोद्वार भी राजा नैन सिंह ने कराया । हस्तिनापुर का दिगम्बर जैन मंदिर(प्राचीन बड़ा मंदिर)1798 ई0 में सूखा पड़ने पर राजा नैन सिंह ने कृषकों की मालगुजारी माफ कर दी थी किन्तु शाह आलम द्वितीय के मांगने पर दो लाख रूप्ये अपने पास से जमा कराए थे। जिसमें से कुछ धन लाला हरसुखराय जैन दिल्ली से लिया था। धन वापस देने पर लाल हरसुखराय ने लेने से इंकार किया और हस्तिनापुर में दिगम्बर जैन मंदिर बनवाने के लिए जमीन और स्वीकृति देने का अनुरोध किया और जिसे राजा नैन सिंह ने स्वीकार किया । दिगम्बर जैन मंदिर हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री श्री सुकुमार चन्द जैन के अनुसार वर्ष 1801 ई0 (सम्वत् 1858 ज्येष्ठ बदी 13)के मेले में लाला हरसुखराय,लाला जयकुमार मल आदि गणमान्य जैनों की उपस्थिति में राजा नैन सिंह ने धरातल से चालीस फीट उंचें टीले पर दिगम्बर जैन मंदिर की नीवं में अपने हाथों से पांच ईंटें रखीं। सिख धर्म का प्रचार राजा नैन सिंह के शासन काल में 1804 ई0 में सिख धर्म का कुछ प्रचार हुआ। किला परीक्षितगढ़ और किठौर के पास के गांवों के गुर्जर सिख तथा जाट सिक्ख राजा नैन सिंह पंजाब से स्वयं अपने साथ लाये थे । हस्तिनापुर के निकट ग्राम सैफपुर निवासी भाई धर्म सिंह (गुरू गोविन्द सिंह के पंच प्यारों में से एक) भी राजा नैन सिंह के पूर्वजों में से थे । आज भी सैफपुर ग्राम के समस्त ग्राम गुर्जर समुदाय के हैं और उनमें राजा नैन सिंह के वंशज ही पंच प्यारे हैं किन्तु राजा नैन सिंह के भाईयों ने सिक्ख धर्म नहीं अपनाया अतः प्रचार सीमित रहा । प्रत्येक व्यक्ति को उन्होने सिक्ख धर्म अपनाने पर जोर नहीं दिया । किले में देवी मंदिर का निर्माण मराठों से युद्ध जीतने के उपलक्ष्य में राजा नैन सिंह ने किले की समीप ही दुर्गा देवी के मंदिर का निर्माण कराया । इस मंदिर में उनके शासनकाल का संस्कृत भाषा की जननी प्राकृत भाषा का शिलालेख आज भी विद्यमान है। यह राजा नैन सिंह की ख्याति का प्रतीक है। इसमें यह भी लिखा है कि इस युद्ध से राजा नैन सिंह अपने राज्य को रूहेलखण्ड तक बढ़ाते हुए चले गए । इस मध्यकालीन भारत में उन्होने अग्रणी राजा के रूप में जनहित के अनेक कार्य किए तथा कराये । मराठा युद्ध के बाद कुंवर बीरबल सिंह ने मराठों से युद्ध में बड़ी बहादुरी से युद्ध किया । अतः उनकी गढ़ी टिकौली के अतिरिक्त उन्हें पांच गांव और ईनाम दिये गये: नंगली खादर,वसी,विराम,कूड़ी कमालपुर और ढिकौली । मराठे युद्ध के समय की तलवार आज भी गढ़ी टिकौली में अवशेष है। इसी तलवार से मराठों से युद्ध किया था।

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