Architectural ruins

PEELI KOTHI,MUSOORIE,GHAZIABAD पीली कोठी,मसूरी,ग़ाज़ियाबाद.

पीली कोठी,मसूरी,ग़ाज़ियाबाद. बहादुर शाह जफर की हार के साथ अंग्रेजों ने 1857 में दिल्ली पर कब्जा जमा लिया। अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखना उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती थी। आस-पास के इलाकों पर नजर रखने के लिए तमाम अफसरों को जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके रहने के लिए अनेकों कोठियां बनाई गईं। इन्ही में से एक कोठी डासना के पास मसूरी में बनवाई गई, जो पीली कोठी के नाम से मशहूर है। 1864 में बनी पीली कोठी ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1864 में पीली कोठी का निर्माण कराया। 3 बीघे में बनी कोठी में 36 कमरे हैं, जबकि इसका कुल रकबा 20 बीघा है। 4 मंजिला कोठी में तीन कमरों में आतिशदान भी बने हैं। इनमें सर्दी में आग जलाने पर कोठी गरम रहती थी। मसूरी और इसके आसपास के इलाकों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दिल्ली में यमुना के लोहे का पुल बनाने वाले इंजीनियर जॉन माइकल्स को दी गई। हालांकि जॉन माइकल्स का पुलिस या सेना से कोई संबंध नहीं था। इस कोठी के साथ उन्हें साढ़े 12 गांव भी दे दिए गए थे। उस समय की व्यवस्था के तहत इन गांवों के किसानों को माइकल्स को लगान देनी पड़ती थी। इस कोठी के निर्माण के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेशनल हाईवे 9 पर स्थित इस इमारत के अलावा अंग्रेजों ने गंग नहर की झाल पर 8 चौकियों का भी निर्माण कराया। दिल्ली-कलकत्ता रेल ट्रैक बिछाने वाले प्रोजेक्ट में मैकेनिकल इंजीनियर थे जॉन माइकल्स दिल्ली का प्रसिद्ध लोहे का पुल उन्होंने ही बनवाया था ब्रिटिश सरकार ने उनके इस कार्य से खुश होकर यह जागीर इनाम के तौर पर जॉन माइकल्स दी थी। बनाया गया रेलवे स्टेशन इस पीली कोठी तक आसानी से पहुंचने के लिए अंग्रेजों ने डासना में रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया। यह दावा इस गांव के लोग करते हैं, हालांकि इसका कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं। समय के साथ अंग्रेजों की स्थिति बहुत मजबूत हो गई। निगरानी की जिम्मेदारी से जॉन माइकल्स को मुक्त कर दिया गया था। जिंदगी के आखिरी पड़ाव में जॉन माइकल्स कर्ज में फंस गए थे। जॉन माइकल्स यह कोठी बेटी ए एल कोपिंगर के नाम कर दिया था। ए एल कोपिंगर इस इलाके मिस साहब के नाम से मशहूर थीं। कुछ सालों बाद इस पीली कोठी का मालिकान हक एक बार फिर बदल गया। जब कॉपिंगर ने अपनी बेटी की शादी अपने मैनेजर करकनल से कर दी। कॉपिंगर की मौत के बाद करकनल इस कोठी के मालिक बन गए। पूर्व व्यवस्था के तहत उन्हें क्षेत्र के साढ़े 12 गांवों की कृषि और आवास का लगान वसूल करने का अधिकार भी मिल गया। ताकि पीली कोठी की शान बनी रहे श्वेत होने के कारण करकनल अपने को भारतीयों से श्रेष्ठ मानते थे। उन्होंने बेटे और बेटी को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया, लेकिन यहां अकेले रहते थे। अपनी श्रेष्ठता को मनवाने के लिए उन्होंने अपने क्षेत्र के पक्की ईंट के मकान बनाने पर पाबंदी लगा दी थी। ताकि पूरे इलाके में सिर्फ एक कोठी नजर आए। हैरतअंगेज रूप से श्वेत होने के नाते खुद को श्रेष्ठ समझने वाले करकनल भारत के आजाद होने के बाद इंग्लैंड नहीं लौटे। यहीं बसने के फैसला किया। इस बीच 1952 जमींदारा उन्मूलन एक्ट आ गया। इससे करकनल के कब्जे वाले साढ़े 12 गांव के किसानों को लगान से आजादी मिल गई लेकिन इससे करकनल की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। इस दौरान करकनल अवैध रुप से जमीन बेचने लगे। यहां तक गांवों में स्थित चारगाहों को भी बेच डाला। साथ ही डीसीएम को 40 बीघा जमीन भी बेच दी। यह मामला बाद में कोर्ट में चला गया। हाई कोर्ट ने इस भूमि को वर्ष 2020 में पुन: एलएमसी में घोषित कर दिया। 1977 में कोठी बेचे गए करकनल करकनल 1977 तक अपनी कोठी में डटे रहे। 1977 में वह दूध व्यापारी हाजी नजीर अहमद को पीली कोठी तीन लाख रुपये में बेचकर इंग्लैंड लौट गए। हाजी नजीर के बाद यह कोठी उनके बेटे पूर्व सांसद अनवार अहमद के पास आ गई। फिलहाल अनवार अहमद के पुत्र इफ़्तिख़ार अहमद परिवार समेत रह रहे हैं। हालांकि मरम्मत के अभाव में कोठी का कई जगह से प्लास्टर झड़ रहा है। पुताई को भी लंबा अरसा हो गया। अभिषेक बच्चन भी आए थे कई फिल्मों शूटिंग इस कोठी में हुई है। सुपर-6 और भंवर जैसे कई हॉरर सीरियल की शूटिंग भी यहां हुई है। इफ़्तिख़ार अहमद बताते हैं कि करीब 20 साल पहले अभिषेक बच्चन की फिल्म रन की शूटिंग इस कोठी में हुई थी। ताहिर बताते हैं कि अभिषेक शूटिंग के लिए दो दिन यहां आए थे। दिल्ली से आते थे शूटिंग करके चले जाते थे। कहां तक आसमां तक फिल्म की शूटिंग 15 दिनों तक यहां हुई थी। Peeli Kothi



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