रसूलपुर जनपद हापुड़ (पश्चिमी उत्तरप्रदेश) के संत-कवि गंगादास जिन्होंने दी रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि.
रसूलपुर जनपद हापुड़ (पश्चिमी उत्तरप्रदेश) के संत-कवि गंगादास जिन्होंने दी रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि.
हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह व खड़ी बोली के आदिकवि संत गंगादास जी (1823-1913) मुंडेर गोत्र के जाट गांव रसूलपुर जनपद हापुड़ (पश्चिमी उत्तरप्रदेश) इनका जन्मस्थान है। इनकी लगभग 7000 साधुओं की फौज झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ थी। रानी लक्ष्मीबाई की सुरक्षा में भी 99% जाट वीरांगनाएं थीं।
अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में सबसे अधिक जाटों का योगदान रहा है।
संत गंगा दास जी अपने समय के प्रकाण्ड पण्डित, महान दार्शनिक, भावुक भक्त, उदासी महात्मा और खड़ी बोली के महाकवि थे।
संत जी ने सैकड़ों काव्य ग्रंथ, कुंडलियां एवं पद लिखे हैं।पार्वती मंगल (दो भाग), नल दमयंती, नरसी भक्त, ध्रुव भक्त, कृष्णजन्म, नल पुराण, राम कथा, नाग लीला, सुदामा चरित, महा भारत पदावली, बलि, बलि के पद रुक्मणी मंगल, प्रह्लाद भक्त, चन्द्रावती-नासिकेत, भ्रमर गीत मंजरी, हरिचंद होली, हरिचंद के पद, गिरिराज पूजा, होली पूरनमल, पूरनमल के पद, द्रोपदी-चीर आदि प्रमुख रचनाएं हैं।
उनके अनेक शिष्य चेतराम, बालूराम, दयाराम, मोतीराम, मोहनलाल आदि उनके पद गा-गाकर लोगों को सुनाया करते थे।
भ्रमण करते हुए ये 1855 ई. में मध्य प्रदेश के ग्वालियर नगर के पास सोनरेखा नाम के नाले के निकट कुटी बनाकर रहने लगे। वहीं इन्होंने 18 जून, 1858 को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का दाह संस्कार किया था, जिसका उल्लेख वृन्दावनलाल वर्मा कृत झांसी की रानी पुस्तक में तथा अन्य ऐतिहासिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। अपने ऐतिहासिक उपन्यास झांसी की रानी में तो वृन्दावनलाल वर्मा ने यहां तक लिखा है कि एक बार लक्ष्मीबाई अपनी अंतरंग सखी मुन्दर के साथ संत गंगादास की कुटिया पर ग्वालियर गई थी। वहां रानी ने संत गंगादास से स्वराज्य स्थापना के विषय में विस्तृत चर्चा की थी। राष्ट्रीय प्रेम और भारत—भक्ति से ओत—प्रोत गंगादास का ह्दय पहले तो यह प्रश्न सुनकर टालता रहा, किन्तु बाद में रानी से उन्होने खुलकर बात की। उन्होंने झांसी की रानी को कहा कि सेवा, बलिदान और तपस्या से ही स्वराज्य की स्थापना हो सकती है। (वृन्दावनलाल वर्मा कृत झांसी की रानी, पृ0 322) भारत को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा देते हुए संत गंगादास ने इनकी ं तक कहा कि यह मत सोचो कि हमारे जीवनकाल में ही स्वराज्य प्राप्ति हो जाए। आप नींव के पत्थर बन जाओ और देशभक्त भी बनते रहेंगे, तब नींव भरने के पश्चात् स्वराज्य का महल उन्नत होगा।
संत गंगादास जी रानी लक्ष्मी बाई के गुरु और उनके सलाहकार थे रानी समय-समय पर आकर संत जी के आश्रम पर उनसे मिलती थीं।
संत जी ने घोड़े पर घूम घूम कर दूर-दराज तक किसानों व युवाओं में क्रांति की लौ जलाई और अंग्रेजों से लड़ने के लिए एक बड़ी सेना तैयार कर ली थी।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के वीरगति को प्राप्त होने के बाद कुछ वीरांगनाएं उनके पार्थिव शरीर को लेकर जंगल में घूम रही थीं। क्योंकि रानी ने घायल अवस्था में कहा था कि मेरे शरीर को किसी अंग्रेज का हाथ न लगने पाए।
किंतु बरसात के कारण दाह संस्कार के लिए सूखी लकड़ियों की व्यवस्था नहीं हो रही थी। तभी उन वीरांगनाओं को जंगल में संत गंगादास जी मिले। संत जी देखते ही स्थिति को भाप गए। संत जी ने वीरांगनाओं से कहा कि मेरी कुटिया में सूखी लकड़ियां हैं और मेरी कुटिया को उधेड़ कर रानी का अंतिम संस्कार कर देते हैं।
संत जी के कुटिया को उधेड़ कर रानी की चिता को मुखाग्नि दी गई। इतने में पीछा करते हुए अंग्रेज सिपाही भी संत जी के आश्रम पर आ पहुंचे। अंग्रेजी सेना और साधुओं के बीच में घमासान युद्ध हुआ साधुओं ने वीरता से युद्ध करते हुए अंग्रेज सिपाहियों को गाजर मूली की तरह काट दिया। यहां पर लगभग 700 साधुओं ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया व अनेक घायल हुए किन्तु वीर साधुओं ने महारानी लक्ष्मीबाई का शव अंग्रेजों के हाथ नहीं आने दिया।
जब तक अंग्रेज सैनिक आश्रम के अंदर घुसे तब तक रानी की चिता जलकर राख हो चुकी थी।
झांसी की रानी के बाद क्रांतिकारियों की टोली की बागडोर को संत गंगा दास जी ने संभाल कर क्रांति की ज्योति को जलाए रखा।
संत जी के गांव रसूलपुर जनपद हापुड़ के निकट कुचेसर रोड चौपला पर संत जी की समाधि स्थित है। आज भी उनकी याद में दशहरे पर मेला लगता है जहां कुश्तियां, रामलीला व अन्य रंगारंग प्रोग्राम होते हैं।