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अद्भुत्त - खिड़की मस्जिद | खिड़की विलेज , दिल्ली .

अद्भुत्त - खिड़की मस्जिद | खिड़की विलेज , दिल्ली . सन् 1320 में दिल्ली पर तुग़लक़ सल्तनत का परचम लहरा रहा था। तुग़लक़ सल्तनत के तीसरे बादशाह फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ थे जिनके दौर में दिल्ली में बहुत से निर्माण कार्य हुए। फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ का दौर 23 March 1351 – 20 September 1388 तक चला। इस बीच दिल्ली में बहुत से पुल , अस्पताल , सराय व मस्जिदें बनायीं गयीं। फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ अपनी सल्तनत के लिए बेहतर इकनोमिक पॉलिसीज़ लाया था। उसका उद्देश्य तुग़लक़ सल्तनत को सभी के लिए खुशहाल जगह बनाना था। जब फ़िरोज़ शाह दिल्ली की गद्दी पर विराजमान था तो उसका एक वज़ीर हुआ करता था मलिक तेलंगनी। मलिक तेलंगनी को भी बादशाह की तरह इमारतें बनाने में बड़ी दिलचस्पी थी। अपने दौर में तेलंगनी ने दिल्ली में 7 अनोखी संरचनाएं बनवायीं जिनमे से एक है खिड़की मस्जिद। मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन से कुछ दूरी पर ही खिड़की विलेज है । यहाँ आबादी के बीचों बीच मौजूद है 700 साल पुरानी यह ऐतिहासिक इबादतगाह। न सिर्फ यह एक पुरानी ईमारत है बल्कि तुग़लक़ आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन नमूना है । दिल्ली में यूँ तो और भी बहुत मशहूर मस्जिदें हैं लेकिन खिड़की मस्जिद की बात अलग है वो क्यों ? आगे आपको बताते हैं। हमें भारत में अक्सर मुग़ल वास्तुकला पर आधारित मस्जिदें ही देखने को मिलती हैं लेकिन यह मस्जिद मुग़ल काल से भी 200 साल पहले की है। खिड़की मस्जिद का नाम खिड़की मस्जिद इसलिए रखा गया क्यूंकि यहाँ मौजूद हैं बेशुमार खिड़की नुमा संरचना। यह मस्जिद 87 मीटर के क्षेत्र में 52 मीटर x 52 मीटर में बनी हुई है । मस्जिद ज़मीन से 3 मीटर ऊंचाई पर है। चारों तरफ खुले आंगन हैं। यही आँगन उस समय मस्जिद के अंदर रौशनी का स्रोत थे। मस्जिद में लगभग 180 पिलर मौजूद है। छत की बात करें तो छत पर 81 छोटे छोटे गुम्बद मौजूद हैं। मस्जिद में दाखिल होने के लिए तीन बड़े दरवाज़े मौजूद है जिन्हे मीनारों से सजाया गया है। मस्जिद की दीवारें मलबे की चिनाई से बनी हैं और बाहर की तरफ़ प्लास्टर की हुई सतह है। आंतरिक दीवारें सादा हैं, लेकिन पारंपरिक नक्काशीदार पत्थर से सजी हुई हैं। तुग़लक़ सल्तनत की अद्भुत रचनाओं में से एक है यह मस्जिद। मस्जिद में कोई पत्थर या शिला नहीं जिस पर इस के निर्माण की तारिख डली हुई लेकिन पुरातत्वीयों की मानें तो यह मस्जिद 1375 या 1380 में बनायीं गयी है। 700 साल एक लम्बा अरसा होता है। समय बीतने के साथ संरचना भी कमज़ोर हुई है। बीते कुछ वक़्त में कुछ गुम्बद गिरे और कुछ दीवारे भी जर्जर हालत में थीं। ऐसे में ASI द्वारा इसे संरक्षित स्मारक माना गया और इसकी मरम्मत का कार्य भी जारी है। बरसों से वीरान पड़ी इस मस्जिद की इतिहास में क्या क़ीमत है यह बस वही जान सकता है जिसे इतिहास की समझ है।

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