इतिहास का सुनेहरा पन्ना - क़स्बा गुलावठी,बुलंदशहर.

Oct 3, 2023 - 23:27
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इतिहास का सुनेहरा पन्ना - क़स्बा गुलावठी,बुलंदशहर. उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर ज़िले का एक छोटा सा क़स्बा है ‘गुलावठी’। आप कभी भी गुलावठी से गुजरोगे तो ये किसी भी साधारण बस्ती जैसा ही लगेगा लेकिन इसका इतिहास ‘शेर शाह सूरी’ के ज़माने से चला आ रहा है। ‘हुमायूँ’ के तख़्त को ‘शेर शाह सूरी’ ने 1538 में जीत लिया था। उसी दौर ‘गुलाब खान’ नाम के एक पठान सरदार का गुज़र इस इलाके से हुए। उन्होंने अपने खानदान के साथ इस जगह को बसाया और इसका नाम पड़ा ‘गुलाब ठिया’। ठिया, बस्ती , नगर आदि उस समय छोटी बसावट वाली जगह के नाम रखे जाते थे। गुलाब ठिया से समय के साथ बदलते हुए यह आज गुलावठी हो गया। एक और धारणा यह भी है कि गुलाब खान ने इसका नाम ‘गुलाब बस्ती’ रखा था। जहा से इसका नाम बदलते बदलते गुलावठी हो गया। गुलावठी मूल रूप से अफ़ग़ानी पठानों की बस्ती हुआ करती थी। लेकिन समय के साथ साथ यहाँ सय्यद आ कर बसने लगे और उनका प्रभाव इस क़स्बे में बढ़ गया। इसी वजह से कुछ समय इस जगह का नाम ‘सादात पुर’ भी हुआ था लेकिन वो इतिहास में लोगों ने अपनाया नहीं। 1555 में हुमायूँ ने दोबारा से मुग़ल सल्तनत की स्थापना की। उस दौर में गुलावठी शाही खानदान की शिकारगाह के लिए एक पसंदीदा इलाका बन गया था। वक़्त गुज़रा और भारत में अंग्रेज़ों का कब्जा हुआ। 1857 की क्रांति अंग्रेज़ों की विरुद्ध एक बहुत बड़ा कदम था। इसने लगभग अंग्रेजी शासन की जड़ें उखाड़ ही दीं थी कि अचानक यह क्रान्ति असफल हो गयी। अंग्रेज़ों ने इस बार दोगुनी ताक़त के साथ भारतियों पर ज़ुल्म किया और बग़ावत करने वालो को कड़ी से कड़ाई यातनाएं दिन। उसी क्रांति के चलते अंग्रेजी सरकार ने गुलावठी की जागीर को भी क़ब्ज़ा लिया था और इसकी नीलामी की थी। उस नीलामी में गुलावठी जागीर को अपने नाम कराने वाले शख्स थे ‘मुंशी सय्यद मेहरबान अली’। सय्यद मेहरबान अली मुंशी मेहरबान अली गुलावठी के इतिहास में एक अहम किरदार हैं। अँग्रेज़ो से नीलामी में गुलावठी की जागीर हासिल करने के बाद मुंशी मेहरबान अली ने अपना महल और एक मस्जिद का निर्माण करवाया। मुंशी महेरबान अली के महल का एक प्रमुख हिस्सा आज भी सलामत खड़ा है। हालाँकि वक़्त के साथ इसका जीर्णोद्धार कराया गया है। महल के अलावा गुलावठी की जामा मस्जिद का निर्माण भी सय्यद मेहरबान अली के ही द्वारा किया गया था। जामा मस्जिद गुलावठी 1857 की क्रांति के नाकाम होने के बाद भारत के स्वतंत्रता सेनानानियों ने एक नयी शुरुआत की थी। जिसमे मुस्लिम सेनानियों के लीडर माने जाने वाले ‘मौलाना क़ासिम नानोतवी’ भी शामिल थे। ‘मौलाना क़ासिम नानोतवी’ ने 1866 में ‘दारुल उलूम देओबंद’ की बुनियाद रखी थी। उस समय दारुल उलूम देओबंद जहाँ एक और शिक्षा और आध्यात्म का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा था वहीँ दूसरी और इन्क़िलाब की सरगर्मियां भी वहां चल रही थीं। ‘मौलाना क़ासिम नानोतवी’ ने अरबी मदरसों के एक नेटवर्क बनाने का इरादा किया जिससे कि आज़ादी की मुहीम को तेज़ किया जा सके। उन्हीं दिनों गुलावठी के नवाब सय्यद मेहरबान अली ने मौलाना क़ासिम नानोतवी को गुलावठी बुलाया। न्योते का मुख्य कारण गुलावठी की जामा मस्जिद की बुनियाद डालना था। जब ‘मौलाना क़ासिम नानौतवी’ ‘सय्यद मेहरबान अली’ से मिले तो उन्होंने नवाब को सलाह दी कि बच्चों की तालीम के लिए मस्जिद के साथ साथ एक मदरसा भी साथ में खोला जाए। इसी के नतीजे में दारुल उलूम देओबंद की स्थापना के चार साल बाद यानी 1870 ईस्वी में गुलावठी की जामा मस्जिद और साथ ही ‘मदरसा मुनब्बा उल उलूम’ की स्थापना भी हुई। तब से अब तक मस्जिद और मदरसा में पढाई और आध्यात्म का सिलसिला जारी है। मदरसे में सदियों पुराने दस्तावेज़ और किताबें मौजूद हैं। आज भी लगभग 300 बच्चे यहाँ तालीम हासिल कर रहे हैं। फातिमा की कोठी सय्यद मेहरबान अली की चार बेटियां थी। उनमें से सब्सि बड़ी बेटी का नाम ‘फातिमा’ था। सय्यद मेहरबान अली ने अपनी बेटी फातिमा के लिए एक कोठी की निर्माण शहर की आबादी से थोड़ा हटके कराया था। आज भी इसके असरात मौजूद है। हालाँकि अंदर तो एक नयी आबादी बस चुकी है। आज के समय में उनके वंशज सय्यद सलीम साहब और उनकी पत्नी यहाँ निवास करते हैं। इसके अलावा सय्यद मेहरबान अली ने बस्ती के लिए और बहुत से काम करवाए। जिसमे शैक्षिणिक संस्थानों के निर्माण के साथ साथ ही काली नदी के ऊपर एक पुल का निर्माण भी शामिल है। सय्यद मेहरबान अली द्वारा निर्मित इस पुल के उद्घाटन के लिए खुद ‘Viceroy of India’ गुलावठी आये थे। इसके अलावा सय्यद मेहरबान अली का मक़बरा भी मैन रोड पर ही स्तिथ है। जिसके आस पास उनके खानदान वालों की क़बरे भी मौजूद है। गुलावठी आज के दौर में गुलावठी किसी भी आम क़स्बे की तरह तरक़्क़ी पर है। शहर में लगभग 20 मस्जिदें, 3 मदरसे, लगभग 20 ही छोटे बड़े मंदिर और एक गिरजाघर भी है। कहना का तात्पर्य यह कि क़स्बे की आबादी मिली जुली है और बहुत अम्न और शान्ति के साथ सब मिल जुल कर रहते हैं। आबादी में अक्सर लोग छोटे व्यवसायों के मालिक हैं, जबकि नौजवनों में अधिकतर नौकरी पेशा हैं। क़स्बे की ज़्यादातर गलियां और सड़कें पक्की हैं। लोग मिलनसार है। आप में से बहुत से लोग यकीनन गुलावठी को जानते होंगे, वहां से गुज़रे होंगे या वहां रहते होंगे लेकिन क्या आप गुलावठी के इस नायाब इतिहास के बारे में जानते थे ?