Religious Marvels

बेगमपुर मस्जिद : इबादतगाह से गाँव बनने तक का सफर ,मालविया नगर,दिल्ली.

बेगमपुर मस्जिद : इबादतगाह से गाँव बनने तक का सफर ,मालविया नगर,दिल्ली. फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के प्रधानमंत्री खान ऐ जहाँ जूना जिसे मलिक तेलंगनी के नाम से भी जाना जाता था , वो भी फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की तरह इमारतें बनाने का शौक़ रखता था। दोनों ने दिल्ली शहर में बहुत से पुल, सराय, अस्पताल व मस्जिदों का निर्माण कराया था। खुद खान ऐ जहाँ जूना ने दिल्ली में सात मस्जिदें बनवायीं थी। जिनके आसार आज भी मौजूद है। जो सात मस्जिदें उन्होंने बनवायीं वह कलां मस्जिद, निजामुद्दीन, कलां मस्जिद तुर्कमान गेट , कालू सराय मस्जिद, चौसठ खम्बा, मस्जिद वाक्या , फ़िरोज़ शाह क़िला मस्जिद, खिड़की मस्जिद और बेगमपुर मस्जिद शामिल हैं। बेगमपुर मस्जिद आज आबादी के बीचों बीच स्तिथ है। हालाँकि अब यह केवल एक टूरिस्ट प्लेस है , इसमें किसी तरह की इबादत नहीं की जाती। मस्जिद को बहार से ही देखने से इसकी भव्यता का अंदाजा हो जाता है। जैसे ही आप मस्जिद के प्रांगण में क़दम रखते हो ऐसे लगता है कि आप कई सदी पीछे उसी समय में चले गए हो। मस्जिद का आँगन काफी ज़्यादा बड़ा है। एक आर्टिकल के मुताबिक मस्जिद 307 फीट x 295 फीट के क्षेत्र में फैली है। कहा जाता है कि यहाँ एक मदरसा और खज़ाना भी हुआ करता था। बेगमपुर मस्जिद तुगलक दौर की वास्तुकला का एक प्रमुख उदाहरण है, न सिर्फ यह एक आम इबादत गाह है बल्कि इसे किले नुमा अंदाज़ में बनाया गया है , जहाँ से न सिर्फ हमले को रोका जा सकता था बल्कि हमला किया भी जा सकता था। यह शाहजहाँ की जामा मस्जिद के बाद शहर की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। हालाँकि यह मस्जिद खान ऐ जहाँ जुना ने इबादत के लिए बनवायी थी लेकिन जब वक़्त बदला तो इसी मस्जिद को एक गाँव में बदल दिया गया। हुआ यूँ की जब मुग़ल सल्तनत अपने आखरी वक़्त की तरफ बढ़ रही थी , उन्हीं दिनों दिल्ली पर ईरान के आक्रांता नादर शाह ने हमला कर दिया। साल था 1739 , नादर शाह की दहशत लोगों में बहुत थी। खुद का बचाने के लिए बहुत से लोग अपना सारा सामान, अपने घरवाले यहाँ तक कि अपनी गाय भैंस लेकर मस्जिद में आ बसे और यह मस्जिद ही बेगमपुर गाँव बन गयी। लगभग 50 परिवार यहाँ आ बसे थे। उन्होंने मस्जिद के प्रांगण में ही अपने रहने के लिए कमरे, टॉयलेट्स और कुंवे बना लिए थे। साल 1921 में ASI द्वारा यहाँ मौजूद लोगों को निकलवा दिया गया लेकिन लोगों ने इसमें कूड़ा कचरा डालना जारी रखा। मस्जिद में पश्चिम की और एक बड़े आकर का दरवाज़ा है जिसे पिश्ताक कहा जाता है इसमें दो मीनारें जुडी हुई हैं और यह मेहराब की और जाता है। मेहराब यानि वो जगह जहाँ इमाम खड़े हो कर नमाज़ पढ़ाते हैं , यही एक मात्र हिस्सा इस मस्जिद का ऐसा है जो काफी साफ़ सुथरा है। मुग़ल वास्तुकला की तरह पत्थरों पर ज़्यादा नक़्क़ाशी या सजावट नहीं , हां यह मज़बूत काफी हैं। इतिहासकारों का कहना है कि पहले इन पत्थरों पर चुने से पुताई हुई होगी। मस्जिद में कुल 64 गुंबद है जिसमे जो मुख्य गुम्बद है उसकी हाईट 9 फुट है मस्जिद के अंदर महिलाओं के नमाज़ पढ़ने के लिए एक विशेष स्थान मौजूद था। हालाँकि काफी समय बीतने की वजह से मस्जिद के काफी हिस्से तहस नहस हो चुके हैं। इसी इसी वजह से अब छत पर जाने पर भी प्रतिबन्ध है। साल 1947 एक और अहम् मोड़ था इस मस्जिद की तारिख में। बटवारे के काले दिनों से हिन्दुस्तान गुज़र रहा था। बाहर से आने वाले रेफूजीज के हाल बहुत ख़राब थे, देश में उन्होंने बसाने के लिए अभी एक निर्धारित सरकार भी नहीं बन पायी थी। ऐसे में बहुत से रिफ़्यूजीस को बेगमपुर मस्जिद ने पनाह दी, और कुछ समय तक यह रेफूजीज के लिए छत का काम किया।

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